मार्क्स सिर्फ मार्क्स हैं, बच्चे की काबिलियत नहीं-How to Handle Bad Grades in Hindi

By Ruchi Gupta|8 - 9 mins| August 03, 2020

क्या आप भी अपने बच्चे पर पूरा जोर लगा देते हैं कि वह स्कूल की परीक्षाओं में अपना बेहतर प्रदर्शन करे? पर तब क्या जब उसके अंक या मार्क्स आपकी उम्मीद के अनुसार नहीं आते? बच्चों को बेहतर शिक्षा देना जरूर हमारा कर्तव्य है, लेकिन स्कूली परीक्षाओं में उनके अंक सिर्फ एक निर्धारित समय के दौरान उनकी समर्थता को दर्शाते हैं। अगर आप भी अपने बच्चे के उम्मीद से कम मार्क्स आने को लेकर परेशान हैं, तो एक बार यहां जरूर देखें।

बच्चे जिनकी परीक्षाओं का परिणाम उनके अनुसार नहीं आता, वे डिप्रेशन या अवसाद का शिकार हो जाते हैं और कई बार वे आत्महत्या तक का विचार करते हैं। इसकी एक बहुत बड़ी वजह बच्चे के माता-पिता और दोस्त भी होते हैं। उनका मानना होता है कि इस परिणाम के साथ वे अपने मम्मी-पापा की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरेंगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले साल 2019 में मई महीने में अकेले तेलंगाना राज्य में ही 25 छात्रों ने आत्महत्या की कोशिश की जिसमें से इस काम में 3 असफल रहे और 22 की मौत हो गई। अगर सरकारी आंकड़ों की बात की जाए तो वर्ष 2016 में ही भारत में 9,474 छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें से 2,413 मामले सिर्फ परीक्षाओं में असफल रहने के कारण थे।

क्या अब भी हमें अपने बच्चे के बेहतर परिणाम के लिए उन्हें झोंकने की जरूरत है। नहीं, बिल्कुल भी नहीं। हममें से शायद ही कोई चाहेगा कि उसका बच्चा सिर्फ एक परीक्षा की वजह से अपने जीवन को समाप्त कर दे। बच्चों को समझाने से अधिक जरूरी है कि पहले हम समझें।

स्कूली परीक्षाओं में बैठने के साथ ही आपका बच्चा अलग-अलग प्रकार के विचारों से जूझते हैं, जिन्हें और मुश्किल बनाते हैं उनके परिणाम की चिंता। इसीलिए बतौर माता-पिता आपके लिए और अधिक संवेदनशील होना आवश्यक है, अपने बच्चे के स्कूली परिणामों के प्रति। जब भी बच्चों के परीक्षाओं में खराब परिणाम आते हैं, वे न सिर्फ खुद को लेकर शंकित हो जाते हैं, बल्कि उनका आत्म-सम्मान भी कम होने लगता है। इन सभी बातों को बच्चे के मानसिक स्वास्थ पर बहुत बुरा असर होता है।

बच्चों के परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन को लेकर हम नर्सरी कक्षा से ही उन पर दबाव बनाने लगते हैं। इसे हम अपनी सामाजिक निष्ठा का सवाल बना लेते हैं और बच्चे की हर कामयाबी पर अपनी मौहर लगाते रहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा साल-दर-साल अपने प्रदर्शन को बेहतर करता चले। लेकिन कभी आपने सोचा है कि अगर वह एक बार भी आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो उसे कैसा अनुभव होता है? क्या आपने कभी अपने बच्चे से कहा है, ‘कोई बात नहीं, अगर तुम्हारे मार्क्स कम आएं। मैं तब भी तुम्हारे साथ हूं।’

बच्चे के समझने से ज्यादा जरूरी है आपका समझना कि उसके रिपोर्ट कार्ड से कई अधिक अहम है आपका बच्चा और उसका आत्म-सम्मान। अगर आपका बच्चा कभी भी अवसाद का शिकार बनता नजर आए, तो उसे विश्वास दिलाएं कि आप उसके साथ हैं। आइए जानते हैं कि आपको ऐसी स्थिति में क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिएः

आप क्या न करें

आपका बच्चा पहले ही अपने परिणाम को लेकर चिंतित है, ऐसे में आपको उसका साथ देना चाहिए और कुछ चीजों का खास ख्याल रखना चाहिए, जिससे आपके बच्चे का डिप्रेशन का स्तर बढ़े नहीं।

1. दूसरों से तुलना

आपका बच्चा पहले ही परेशान है, ऐसे में उसकी दूसरों से तुलना करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अगर उसके मार्क्स कम आए हैं तो आप उससे यह भी न पूछें कि उसकी क्लास में सबसे अच्छे नंबर किसके आए हैं। ऐसा करने से बच्चों को लगता है कि वे दूसरों की तुलना में निम्न हैं।

2. कड़ी सजा देना

अक्सर हम सब अपने बच्चों को उनकी गलतियों पर सजा देते हैं, लेकिन परीक्षाओं में बेहतर परिणाम न ला पाने के लिए उन्हें कड़ी सजा देना बच्चों के लिए सही नहीं है। खासतौर पर जब बच्चा उसे समझने के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं हो। जैसे कि आप पहली या दूसरी कक्षा के बच्चे को बाहर खेलने से रोक दें। क्या वाकई बच्चा इस सजा के लिए तैयार है? या फिर आप टीनएन बच्चों को सोशल मीडिया या टीवी का इस्तेमाल करने से बंद कर दें। ऐसे में बच्चा वाकई सबसे कट जाएगा और उसे मानसिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

3. अपना गुस्सा निकालना

निश्चित तौर पर आपके और आपके बच्चे के जीवन में उसका शैक्षिक परिणाम बहुत अहम है। आपने बच्चे की पढ़ाई पर अपना काफी समय और पैसा लगाया है। ऐसे में जब उसका परिणाम आपने अनुसार न हो तो लाजिमी है कि आपको गुस्सा भी आएगा। लेकिन ऐसे में आपको अपने गुस्से पर काबू पाना होगा और अपने बच्च पर अपनी भड़ास को निकलने से रोकना होगा। आपके गुस्से से बच्चे की मानसिक स्थिति और खतरनाक हो सकती है। आप माने या न माने पर अध्ययन बताते हैं कि जिन माता-पिता का दबाव बच्चों पर परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने का रहता है, उनके बच्चे की एंग्जाइटी डिस्ऑर्डर (anxiety Disorder) के शिकार होने की दोगुना आशंकाएं होती है।

आप क्या करें

बच्चे का परिणाम आपके हाथ में है और बच्चा आपके सामने। ऐसे में बेहद जरूरी है कि आप बच्चे की भावनाओं को समझें और उनसे सामान्य व्यवहार रखें। आइए जानते हैं कि आप ऐसे स्थिति को सामान्य बनाने के लिए और क्या-क्या कर सकते हैं।

1. बच्चे से बातचीत करें

सबसे ज्यादा जरूरी है बच्चे से बातचीत करना। आप बातचीत के माध्यम से ही यह समझ सकते हैं कि वे किस मानसिक दौर से गुजर रहा है। साथ ही आप उससे बात कर, उसे भी यह समझा सकते हैं कि यह सिर्फ शैक्षिक परिणाम है। उसकी जिंदगी में अभी और भी कई परीक्षाएं आएंगी, जिनमें वे और बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। आप बड़े बच्चों से यह भी पूछ सकते हैं कि अगर उन्हें जरूरत लगे तो वे किसी करियर काउंसलिंग सेशन में भी जा सकते हैं।

2. व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों के प्रति सर्तक रहें

बच्चे परीक्षाओं को लेकर काफी बेचैन और चिंतित होते हैं। ऐसे में अगर उनका परिणाम उनकी या माता-पिता की उम्मीदों के अनुसार न आए तो उनके व्यवहार में बहुत तेजी से बदलाव आने लगते हैं। जैसे वे खाना खाना कम कर देते हैं, उन्हें ठीक से नींद नहीं आती, अकेले में रोते हैं, बेहद चिड़चिड़ा होते हैं या हमेशा सिद दर्द या बेचैनी की शिकायत करना। ये कुछ ऐसे संकेत हैं, जिन्हें आप नजरअंदाज नहीं कर सकते।

जब भी आपका बच्चा अच्छा महसूस न करे, तो आप उसका ध्यान उसके परिणामों से हटाकर किसी भी अच्छी दिशा में ले जाएं। जरूरी है आपका इस स्थिति में अपने बच्चों का दोस्त और मार्गदर्शक बनना। आप बच्चे में उसका आत्म-विश्वास लौटाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

3. हर बच्चा है खास

आप अपने बच्चे को समझाएं कि वे कैसे दूसरों से अलग और बेहतर है। जैसे हर बच्चा अच्छा गायक या आर्टिस्ट नहीं हो सकता, वैसे ही जरूरी नहीं कि हर बच्चा 90 फीसदी अंक लाएं। हर बच्चे की अपनी योग्यताएं और पसंद होती है। इसीलिए जरूरी है कि आप उसके इन्हीं योग्यताओं और पसंद को बढ़ावा दें। बतौर माता-पिता आप अपने बच्चे की खूबियों को प्रोत्साहित करें।

4. आपका रवैया रखता है मायने

माता-पिता किस स्थिति पर कैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं और उसे कितना समझते हैं, बच्चा इस बात को बहुत अच्छे से समझता है। आप परीक्षाओं को बच्चे के जीवन में कितनी तरजीह देते हैं, आपका रवैया परीक्षाओं के प्रति कैसा है, यह काफी अहम होता है। हमारी कोशिश यह रहनी चाहिए कि हम परीक्षाओं को ऐसा मानकर चलें कि वे हर साल आएंगी और बच्चा उनके लिए तैयार रहे, न कि साल में एक बार ही परीक्षाएं होती हैं और बच्चे को अपना पूरा जोर लगा देना चाहिए।

5. परीक्षाओं में तनाव की स्थिति को और बढ़ावा न दें

बच्चे को हमेशा पढ़ाई के लिए बोलते नहीं रहना चाहिए। कई बार तो ऐसी स्थिति देखने को मिल जाती है कि बच्चे पढ़ाई से दूर जाने लगते हैं। आप बच्चों के लिए पढ़ने का समय निर्धारित न करें, बल्कि उन्हें खुद अपने लिए यह काम करने दें। बेहतर यह होगा कि आप बच्चे से कैसे पढ़ा जाए या आप उनकी कैसे मदद कर सकते हैं, इस बारे में बात करें। उन्हें उनकी छोटी-छोटी जीत पर शाबाशी दें या प्रोत्साहित करें। आप उन्हें उनके मोबाइल फोन या टीवी में भी कुछ समय बिताने का मौका दें, न कि परीक्षाएं हैं, कहकर उनसे ये सब छीन लें।

इस स्थिति में आपको क्या करना चाहिए, यह जानने के लिए जरूरी है कि आप खुद को बच्चे की जगह रख कर सोचें। ऐसा करने से आप बोलने से पहले यह जरूर सोचेंगे कि ऐसा कहने या करने का क्या असर हो सकता है। उम्मीद है कि अब आप अपने बच्चे के किसी भी तरह के परिणाम को स्वीकार कर पाने में खुद को समर्थ महससू कर रहे होंगे। अब भले ही बच्चे के मार्क्स कैसे भी हों, उन्हें अपने पास बिठा कर यह जरूर कहिएगा, ‘तुम डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूं।’


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Ruchi Gupta

Last Updated: Mon Aug 03 2020

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