छोटे बच्चों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक विकास: 1 से 3 साल तक- 1-3-years Psychological and Emotional Development in Hindi

By Ruchi Gupta|7 - 8 mins| August 11, 2020

जैसे हम बच्चों के बढ़ने को उनकी गतिविधियों से मापते हैं, बिल्कुल ऐसे ही उनमें दिमाग और भावनाओं का विकास किस स्तर पर होता है, इस बारे में जानने के लिए हम बच्चों के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक गतिविधियों को भी ध्यान में रखते हैं। आइए आज जानते हैं कि किस उम्र के बच्चे किस तरह की गतिविधियों को कर पाने में सक्षम होते हैं।

छोटे बच्चे किस उम्र में कौन सी मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक गतिविधि करने में होते हैं सक्षम:

प्रीरीडिंग (12 से 36 माह)

ज्यादातर सभी बच्चों को सोते समय कहानियां सुनना बहुत पसंद होता है। इसकी वजह यह है कि इस समय वे मम्मी या पापा के पास रहते हुए, रंगीन तस्वीरों को देख भी सकते हैं। लेकिन इस समय वे सिर्फ अपने माता-पिता के साथ ही आराम नहीं करते, बल्कि यहां से उनकी पढ़ाई से संबंधित कुशलताओं को सीखने की शुरुआत भी होती है, जैसे किः

  • किताबें कैसे खोलते हैं, इनके अंदर कहानियां कैसी दिखती हैं।
  • हम किताबों को बाएं से दाएं पढ़ते हैं।
  • किताबें हमें कहानियों से रू-ब-रू कराती हैं।
  • कहानियों में शुरुआत और अंत होता है।

अपने बच्चों में पढ़ाई के प्रति लगाव को बढ़ावा देने के लिए आप यह भी कर सकते हैंः

  • तेज आवाज में कहानी को पढ़ना
  • बच्चों को कहानी या बच्चों की अन्य किताबों से खेलने का मौका दें, ताकि वे अपनी किताब और उसकी सामग्री से परिचित हो जाएं।
  • पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया को छोटा करें। छोटे बच्चों में एकाग्रता बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है। 10 या फिर 5 मिनट भी कभी-कभी उनके लिए बहुत लंबा वक्त होता है।
  • बच्चे से प्रश्न पूछें। आप बच्चे को किताब सामने रखते हुए उससे बहुत साधारण सी चीजें, जैसे कि किताब में बने बच्चे की आंखें कहां हैं या सुंदर सा फूल कहां है, उससे पूछ सकते हैं। आप इससे बच्चे के लिए पढ़ने की प्रक्रिया को दिलचस्प बना सकते हैं, जिसमें बच्चा भी भाग ले सकता हो।
  • बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान दें। अगर आपका बच्चा खुद से किताब ले कर कुछ देखना चाहता है तो उसे ऐसा करने दीजिए। आप उसे अपनी गोद में बिठा लें और गौर कीजिए कि वह क्या देख रहा है।

आत्मनिर्भर होना (18 से 36 माह)

ज्यादातर छोटे बच्चे खासकर शिशु खुद को अपने माता-पिता से अलग नहीं समझ पाते। लेकिन जल्द ही जैसे-जैसा बच्चा दूसरे साल में पहुंचता है, उन्हें यह बात समझने में देर नहीं लगती कि वे अलग हैं, उनका अपना भी अस्तित्व है। इसी वजह से वे खुद से अपने काम करने की कोशिश करने लगते हैं, जैसे कि अपने लिए पानी या कोई बर्तन लेने रसोई तक जाना। खुद से अपनी चप्पल पहनना आदि। आइए जानते हैं, कि आप कैसे अपने बच्चे को आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकते हैं:

  • बच्चे को अपना काम करने में देरी लग सकती है, आप इस बात के लिए खुद को तैयार कर लें। अगर वह खुद से अपना कोई कपड़ा या जूते पहनना चाहता हो और आपको कहीं बाहर जाना हो तो इसमें आपको देरी हो सकती है, इस बात को आप मान लें।
  • आप उसे अपने छोटे-छोटे कामों में शामिल करें। जैसे कि सूखे हुए कपड़ों को अंदर करना या फिर गंदे कपड़ों को अलग रखना। खाने से पहले टेबल पर बर्तन रखना आदि।
  • बच्चों को सीखने में वक्त लगता है, इसलिए जरूरी है कि आप अपने सब्र को बनाए रखें। बच्चों को छुरी-कांटे से खाना खाना सीखने या फिर अपनी पेंट का बटन लगाने में वक्त लगता है, लेकिन आप अपने बच्चे के लिए अपना धैर्य बनाए रखें और उसे सीखने दें।
  • आपका बच्चा अपनी उम्र के साथ-साथ आत्मनिर्भर होना सीख रहा है, आपको उस समय खुद पर और अपने गुस्से पर पूरा काबू रखना होगा। हो सकता है आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ वह आपको हर समय न, नहीं करना या नहीं खाना जैसे शब्द बोले। ऐसे में अपने बच्चे को प्यार से समझाएं न कि उस पर गुस्सा करें।
  • अगर आपका बच्चा कोई गैरजरूरी या ऐसी कोई मांग जिसमें उसे नुकसान पहुंच सके, नहीं करता है तो आपको भी उसे उस काम को करने की इजाजत दे देनी चाहिए।
  • अपनी बात पर टिके रहें, जहां जरूरी हो। अगर आपको लगता है कि बच्चे को आपकी बात सुनने की जरूरत है तो सही समय पर, सही तरीके से और शांति को बनाए रखते हुए बच्चे को अपनी बात कहें। जैसे कि अगर आप छोटे बच्चे को कार में बिठा कर सीट बेल्ट पहनाते हैं और वह आनाकानी करे तो आप उसे आसान शब्दों में समझाएं कि कार में कार सीट बेल्ट न पहनने से काफी नुकसान हो सकते हैं।

आसान वाक्यों का प्रयोग करना (18 से 24 माह)

जिस दिन से आपके बच्चे ने मुंह से अपना पहला शब्द कहा था, उसी दिन से वह बोलने की दिशा में आगे बढ़ने लगा था। हाव-भावों, अलग-अलग आवाजों और शब्दों को मिला जुला कर इस उम्र के बच्चे दो से तीन शब्दों वाले वाक्यों का प्रयोग करने लगते हैं। यह समय इतना खास होता है, क्योंकि माता-पिता और बच्चे के बीच बातचीत का दौर शुरु हो जाता है। पर ऐसे में अब भी आपको सब्र रखना होगा। भले ही बच्चे को कुछ शब्द मालूम है, लेकिन उसे अभी उनका पूरी तरह से मतलब नहीं पता और हो सकता है कि वह आपको अपनी बात सही से समझा पाने में भी असमर्थ रहे। बच्चे को बातचीत करने के लिए प्रोत्साहित करें:

  • अपने बच्चे की बात या उसके वाक्य को वहीं रोकें नहीं। इससे बच्चों में गुस्सा बढ़ने लगता है।
  • इस बात का ध्यान रखें कि बच्चा सिर्फ तभी रोता है, जब वह थका हुआ हो, भूखा हो, किसी बात से चिढ़ा हुआ हो या फिर उसे उसकी बात न करने दी जाए।
  • बच्चे को बोलने के अलग-अलग मौके दें, खासकर तब जब आपके घर में उससे बड़े बच्चे भी मौजूद हों।
  • जैसे-जैसे आपके बच्चे बोलना सीख रहे हों, आप इस बात का ख्याल जरूर रखें कि उनके सामने सभ्य शब्दों का ही इस्तेमाल करें। क्योंकि बच्चे तो हमसे ही सीखते हैं और अगर आप बच्चे को बार-बार टोकेंगे उसके उच्चारण या व्याकरण के लिए तो उसे इस बात का बुरा लगेगा और वह बातचीत बंद भी कर सकता है।

सहानुभूति के बारे में सीखना (24 माह)

लगभग-लगभग 2 साल की उम्र के होते-होते बच्चों का अपनी भावनाओं और व्यवहार और दूसरों की भावनाओं और व्यवहार के साथ संपर्क बनता है। दूसरों से बातचीत करने और उनसे दोस्ती बढ़ाने के लिए यह भावनाएं ही नींव का काम करती हैं। बच्चे में सहानुभूति को बढ़ाने के लिए:

  • अगर आपके बच्चे को किसी बात का बुरा लगे तो उसे आप तुरंत मनाने की कोशिश न करें। आप अपने बच्चे को उसे भावों को पहचान कर खुद से सीखने में मदद करें। उससे जानने दें कि वह क्यों दुखी है, उसकी वजह उसका खिलौने टूटना है या कुछ और। साथ ही उसे समझाएं कि उसका इस समय दुखी होना ठीक है, उसे रोने से रोकें नहीं।
  • आप बच्चे से अपने भावों को भी छुपाएं नहीं। अगर आप गुस्सा हैं, आप दुखी हैं या किसी बात का आपको बुरा लगा तो आप बच्चे को दिखाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आप बच्चे के सामने बहुत उग्र रूप से किसी भी भाव को सामने न लाएं, जिससे बच्चा बेचैन हो जाए या डर जाए।

अपने बच्चे की भावनाओं को समझें

कई बार अचानक से ही बच्चे गुस्सा करने लगते हैं या रोने लगते हैं और वे अपनी भावनाओं को ठीक तरह से समझा नहीं पाते। साथ ही इस उम्र में वे एक साथ कई चीजें सीख रहे होते हैं, इसीलिए कई जगह वे भी परेशान हो जाते हैं। ऐसे में माता-पिता होने के नाते जरूरी हो जाता है कि आप उनकी भावनाओं को समझें। अगर वे अपनी बात बोल कर आपको नहीं समझा पा रहे तो आप कोशिश करें कि वे आपको उसके संबंधित कुछ दिखाएं ताकि आप समझ जाएं।

बच्चों की किसी भी बात को अच्छा है या बुरा है के दरमियान समझने से बेहतर है कि आप उनकी गतिविधियों को संकेतों के रूप में समझने की कोशिश करें। जब भी बच्चे परेशान होते हैं तो वे आपके पास खुद को सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं। आप उन्हें अपनी बांहों में भरें और उन्हें विश्वास दिलाएं कि आप उनके साथ हैं। हो सके तो उन्हें कुछ समय के लिए कहानियां सुनाएं। उम्मीद है कि ऐसे में बच्चा जल्दी ही अपनी सामान्य स्थिति में वापिस आ जाएगा।

जैसा कि हम जानते हैं, सभी बच्चे अलग होते हैं, इसीलिए वे अलग-अलग समय पर अपने मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक विकास से जुड़ी गतिविधियों को कर पाते हैं। यहां बताई गई समय सीमा किसी भी बच्चे की मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक विकास की तय सीमा नहीं है।


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Ruchi Gupta

Last Updated: Tue Aug 11 2020

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